आज है सारा मानव जाती बुरे हाल में,
काला हो समझो जैसे की पुरे दाल में,
फस गये है हम अपने ही बुने जाल में.
दाल में काला है काले में दाल पता नही,
पता बस इतना सच्चे को ये दुनिया दवा रही.
कहने को बस सच्चे को बोलबाला झूठे का मुह काला,
कहने को कहो सच्चाई तो लग जाए सवो के मुह ताला.
बना मानव वो गधा जो न जा सके घर नाही घाट,
हर जगह है फरेव जैसे भरा हो खटमलो से खाट.
हो गया मै हु, इस झूठी जिन्दगी से बोर.
पता नही किस चौक पर जाऊ इस जहा को छोर.
बच न गया कुछ शेष अब ऐसा करू जिसपे मै शान,
बचा साके अब तुही सबो को ओ मेरे भगवान.
नीरज कुमार........


















